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हायर एजुकेशनल सिस्टम ‘कॉन्ट्रैक्ट’ में ले रहा काम…डिग्री बड़ी, पर रिगुलर नौकरी नहीं..PhD और NET पास युवा हो रहे परेशान…सरकार कब देगी ध्यान..?

किसी भी पढ़ने लिखने वाले युवा के लिए UGC NET/ PhD की डिग्री हासिल करना बड़ी मेहनत और लगन की बात है लेकिन सरकारी विश्वविद्यालयों या संस्थानों में असिस्टैंट प्रोफेसर बनने का सपना सच होने हकीकत से कोसो दूर होता जा रहा है। सरकार और मीडिया ने जिस तरह से हाल ही में लीक हुए NEET पेपर लीक केस में बहुत एक्टिव नज़र आई। एजुकेशन और करियर से जुड़े अन्य मुद्दों पर न तो सरकार का ध्यान है और न ही मीडिया एजुकेशन बीट को सीरियसली कवर करती है। आज हॉयर एजुकेशन सिस्टम में नौकरियों से संबंधित भारी अव्यवस्था व्याप्त है। गवर्नमेंट यूनीविर्सिटीज में हर साल लगभग 8 महीने के लिए “कॉन्ट्रैक्ट”, “गेस्ट फैकल्टी” और “एडहॉक” नियुक्तियां की जा रही हैं। PhD और UGC-NET पास आवेदकों को न तो रिगुलर फैकल्टी की तरह सैलरी दी जाती है और न ही रिगुलर नौकरी, आइए जानते हैं कि इस गंभीर समस्या का समाधान क्या है?

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नई दिल्ली। करियर डेस्क
रामेंद्र कुमार (बदला हुआ नाम) ने जब अपने पहले ही प्रयास में UGC-NET क्लियर किया, तो उसके घर में मिठाइयाँ बंटी थीं। इसके बाद उसने एक अच्छी यूनीवर्सिटी से पीएचडी भी कर लिया और 35 साल की उम्र के पड़ाव को पार कर लिया।
रामेंद्र के  माता-पिता को लगा कि एक दिन बेटे की मेहनत रंग लाएगी और अब वह जल्द ही किसी सरकारी यूनीवर्सिटी या सरकारी डिग्री कॉलेज में प्रोफेसर बनेगा लेकिन वह आज अस्थायी नौकरी पर बहुत ही कम वेतन पर गेस्ट लेक्चरर के रूप में पढ़ा रहा है।
यह कहानी सिर्फ राहुल की नहीं है, बल्कि भारत के लाखों छात्रों की कहानी है जो अलग अलग सब्जेक्ट्स में नेट-क्वालिफाइड और पीएचडी पास हैं लेकिन सरकार उन्हें स्थाई रोजगार नहीं दे पा रही।
‘ठेके’ पर शिक्षक, ठेंगे पर शिक्षा !
देश का कोई केंद्रीय विश्वविद्यालय हो या प्रदेश का कोई स्टेट यूनीवर्सिटी हो, लगभग सभी जगहों में “कॉन्ट्रैक्ट”, “गेस्ट फैकल्टी” और “एडहॉक नियुक्तियों” की जाती है। ये प्रक्रिया साल दर साल लगभग हर साल हो रही है।
उच्च शिक्षित युवाओं का दुर्भाग्य देखिए कि इन सरकारी संस्थानों में कंडीडेट PhD UGC-NET पास चाहिए लेकिन उनको सैलरी किसी रिगुलर क्लर्क के बराबर मिलती है और नौकरी का भी कोई ठिकाना नहीं।
आज स्थिति यह है कि विश्वविद्यालय और कॉलेज नियमित भर्ती निकालने से बच रहे हैं। कई संस्थानों में वर्षों से स्थायी पद खाली पड़े हैं, लेकिन पढ़ाई कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों के भरोसे चल रही है।
ऐसे शिक्षकों को न तो नौकरी की सुरक्षा मिलती है, न सम्मानजनक वेतन और न ही भविष्य की कोई गारंटी। विडंबना यह है कि जिन युवाओं ने रिसर्च, NET, JRF और पीएचडी में अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण वर्ष लगा दिए, वे आज अस्थायी नियुक्तियों में सीमित होकर रह गए हैं।
निजी संस्थानों का हाल भी कुछ बेहतर नहीं है क्योंकि वहाँ कोई यूजीसी का पेस्केल नहीं मिलता। वहां अक्सर मिलने वाला वेतन उस कड़ी मेहनत और उच्च योग्यता के अनुपात में बहुत कम होता है जो इस मुकाम तक पहुँचने के लिए जरूरी है।
समस्या का क्या है समाधान?
हमारी हायर एजुकेशनल सिस्टम में बड़ी खामियां है और संरचनात्मक कमियां हैं जिनकी ओर सरकार का ध्यान नहीं है। इस संकट से उबरने के लिए सरकार को हायर एजुकेशन सिस्टम में ठोस सुधार और बदलाव करने की आवश्यकता है जैसे
  • स्थायी भर्तियां: उच्च शिक्षा में नियमित और स्थायी फैकल्टी की भर्ती प्रक्रिया तेजी से हो। जरूरत इस बात की है कि केंद्र और राज्य सरकारें विश्वविद्यालयों में खाली पड़े पदों पर तत्काल नियमित भर्ती करें।
  • यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय को एक राष्ट्रीय स्तर की पारदर्शी भर्ती नीति बनानी चाहिए, ताकि योग्य युवाओं को समय पर अवसर मिल सके। किसी सोर्स, सिफारिश से नहीं केवल टैलेंट के बेसिस पर सिलेक्शन करना चाहिए।
‘गुरू’ बिना कैसे बनेंगे“विश्वगुरु”?
उच्च शिक्षा संस्थानों में यह संकट और गहरा है, क्योंकि यहां “योग्यता” तो मांगी जाती है, लेकिन उसके अनुरूप अवसर नहीं दिए जाते। नई शिक्षा नीति, रिसर्च, इनोवेशन और वैश्विक रैंकिंग की बातें जरूर हो रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है।
एक ओर सरकार “विश्वगुरु” बनने का सपना दिखाती है, दूसरी ओर शिक्षकों की स्थायी नियुक्तियों को टालती रहती है। शिक्षा व्यवस्था में कॉन्ट्रैक्ट संस्कृति बढ़ने से गुणवत्ता पर भी असर पड़ रहा है। अस्थायी शिक्षक हर समय नौकरी जाने के डर में रहते हैं, ऐसे में उनसे शानदार रिसर्च और टीचिंग की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
यदि देश के सबसे पढ़े-लिखे युवा ही असुरक्षित और बेरोजगार रहेंगे, तो यह केवल शिक्षा व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के साथ अन्याय होगा।
अब समय आ गया है कि सरकार घोषणाओं से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाए क्योंकि “कॉन्ट्रैक्ट पर चल रही शिक्षा” किसी भी विकसित राष्ट्र की पहचान नहीं हो सकती।
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