📞
समाचारों और विज्ञापनों के लिए संपर्क करें News & Advertisement Enquiry
best news portal development company in india

“दीवारों के बिना पुस्तकालय: एक युवा की अनोखी पहल”

आज के डिजिटल युग में जहां बच्चे अधिकतर समय मोबाइल फोन और स्क्रीन के साथ बिताते हैं, वहीं एक 19 वर्षीय युवक करण ने एक ऐसी पहल की है, जो समाज के लिए एक सकारात्मक उदाहरण बन रही है।

SHARE:

अर्शप्रीत कौर

आज के डिजिटल युग में जहां बच्चे अधिकतर समय मोबाइल फोन और स्क्रीन के साथ बिताते हैं, वहीं एक 19 वर्षीय युवक करण ने एक ऐसी पहल की है, जो समाज के लिए एक सकारात्मक उदाहरण बन रही है।

शहर के एक छोटे से इलाके में, एक पेड़ के नीचे रखा हुआ लकड़ी का एक बॉक्स बच्चों के लिए ज्ञान का खजाना बन चुका है। यह कोई साधारण बॉक्स नहीं, बल्कि एक “ओपन लाइब्रेरी” है, जिसे करण ने शुरू किया है।

इस पुस्तकालय की सबसे खास बात यह है कि इसमें कोई दीवारें नहीं हैं, कोई रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया नहीं है और न ही कोई शुल्क लिया जाता है। कोई भी व्यक्ति यहां आकर किताब ले सकता है, पढ़ सकता है और बाद में वापस रख सकता है।

करण बताता है कि इस पहल की प्रेरणा उसे तब मिली जब उसने अपने आसपास के बच्चों को देखा, जो पढ़ना तो चाहते थे, लेकिन उनके पास किताबें खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। उसने सोचा कि क्यों न कुछ ऐसा किया जाए जिससे इन बच्चों को पढ़ने का मौका मिल सके।

शुरुआत में करण ने अपनी पुरानी किताबों से इस लाइब्रेरी की शुरुआत की। धीरे-धीरे उसके दोस्त और पड़ोसी भी इस पहल से जुड़े और उन्होंने भी किताबें दान करनी शुरू कर दीं। आज इस छोटे से बॉक्स में 150 से अधिक किताबें हैं, जिनमें कहानी की किताबें, पाठ्य पुस्तकें और सामान्य ज्ञान से जुड़ी किताबें शामिल हैं।

हर शाम इस पेड़ के नीचे बच्चों की भीड़ लग जाती है। कुछ बच्चे वहीं बैठकर किताबें पढ़ते हैं, जबकि कुछ उन्हें घर ले जाते हैं। यह दृश्य न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि यह भी दिखाता है कि यदि अवसर मिले, तो बच्चे सीखने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।

करण केवल किताबें उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। वह छोटे बच्चों की मदद भी करता है, उन्हें कठिन शब्द समझाता है और उन्हें नियमित रूप से पढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

इस पुस्तकालय में कोई सख्त नियम नहीं हैं। किताबें समय पर लौटाने के लिए कोई जुर्माना नहीं है। यह पूरी तरह से विश्वास पर आधारित है। करण का मानना है कि “विश्वास ही सबसे बड़ा नियम है।”

स्थानीय लोग करण की इस पहल की सराहना कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस प्रयास के कारण बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि बढ़ी है और वे मोबाइल फोन से दूर होकर किताबों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

करण की यह छोटी-सी पहल यह साबित करती है कि समाज में बदलाव लाने के लिए बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। एक अच्छा विचार और सच्ची नीयत ही काफी होती है।

यह कहानी हमें सिखाती है कि शिक्षा केवल स्कूलों और इमारतों तक सीमित नहीं है। अगर चाह हो, तो ज्ञान कहीं भी और किसी भी रूप में बांटा जा सकता है।

सबसे ज्यादा पढ़ी गई ख़बरें