नई दिल्ली, नई पीढ़ी के निकोटीन उत्पाद जैसे हीट-नॉट-बर्न (HNB) डिवाइस और वेपिंग प्रोडक्ट्स को लेकर गंभीर चिंताएँ सामने आई हैं। मानव रचना इंटरनेशनल स्कूल की पूर्व प्राचार्या सीमा अनीस ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर आरोप लगाया है कि वे युवाओं की मानसिकता को प्रभावित कर एक खतरनाक व्यावसायिक रणनीति को बढ़ावा दे रही हैं।
“युवाओं की मानसिकता के साथ खेल रही हैं कंपनियाँ”
‘Educating for Values, Protecting Our Children’ विषय पर आयोजित सेमिनार में बोलते हुए सीमा अनीस ने कहा कि ये कंपनियाँ आकर्षक और आधुनिक दिखने वाले उत्पादों के जरिए युवाओं को लुभा रही हैं।
उन्होंने कहा:
“वेपिंग कंपनियाँ उपभोक्ताओं की मानसिकता के साथ खेल रही हैं। यह सिर्फ एक व्यापारिक रणनीति है—और वह भी बेहद दुष्प्रेरित।
हालिया अध्ययनों और सेमिनार चर्चाओं में यह सामने आया है कि बड़ी संख्या में छात्र:
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वेपिंग की कानूनी स्थिति से अनजान हैं
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इसके स्वास्थ्य जोखिमों को समझ नहीं पा रहे
यह स्थिति नियमों और वास्तविक जागरूकता के बीच गंभीर अंतर को दर्शाती है।
HNB उत्पाद: “कम नुकसान” का भ्रामक दावा
सीमा अनीस के अनुसार, HNB डिवाइस को “कम नुकसान वाले विकल्प” के रूप में प्रस्तुत करना भ्रामक है।
उन्होंने कहा कि यह रणनीति विशेष रूप से युवाओं में जोखिम की धारणा को कम करने के लिए तैयार की गई है, ताकि कंपनियाँ नए बाजारों में अपनी पकड़ बना सकें।
नियम और नीतियों में बदलाव की जरूरत
भारत में तंबाकू नियंत्रण कानून (2003) मौजूदा तकनीकी बदलावों के अनुरूप नहीं हैं।
उन्होंने मांग की:
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HNB डिवाइस पर स्पष्ट नियम
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निकोटीन पाउच और ई-सिगरेट पर सख्त नियंत्रण
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नई तकनीकों के लिए अपडेटेड पॉलिसी
कैसे होगा समाधान?
कार्यक्रम में यह भी जोर दिया गया कि:
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नीति-निर्माताओं
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शिक्षकों
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अभिभावकों
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स्वास्थ्य संस्थानों
के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।
साथ ही, जागरूकता अभियानों को भी कंपनियों की आधुनिक मार्केटिंग रणनीतियों के अनुरूप बनाना होगा।
बच्चों को बचाने की मुहिम
मदर्स अगेंस्ट वेपिंग (MAV) एक मंच है, जो बच्चों और युवाओं को वेपिंग और ई-सिगरेट के खतरे से बचाने के लिए काम कर रहा है।
इसका उद्देश्य है:
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जागरूकता फैलाना
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नीति सुधार को बढ़ावा देना
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युवाओं को निकोटीन के जाल से बचाना
वेपिंग और HNB डिवाइस का बढ़ता चलन भारत में एक नई सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते सख्त नीतियाँ और जागरूकता अभियान नहीं चलाए गए, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर गंभीर हो सकता है।
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