लखनऊ के 15 बच्चों की मौत कोई सामान्य दुर्घटना नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम द्वारा की गई ‘संस्थागत हत्या’ है। अब समय सिर्फ शोक मनाने या मुआवजे का ऐलान करने का नहीं है।
अगर अब भी सरकार और समाज ने मिलकर भ्रष्टाचार की इस चेन को नहीं तोड़ा, तो अगली बार किसी और मासूम का भविष्य इस लापरवाही की भेंट चढ़ जाएगा। सरकार को अब ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति अपनानी ही होगी।
केवल फायर सेफ्टी एनओसी (No Objection Certificate) की जांच कर लेना अब काफी नहीं है। अगर इस जानलेवा बीमारी को जड़ से खत्म करना है, तो सरकार को तात्कालिक कदमों से आगे बढ़कर निम्नलिखित ठोस और सख्त नीतियां लागू करनी होंगी:
इंफ्रास्ट्रक्चर का ‘थर्ड पार्टी’ और सरप्राइज ऑडिट
अब तक की व्यवस्था में एनओसी एक बार मिल जाने के बाद सालों तक उसकी सुध नहीं ली जाती।
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सरप्राइज चेक: सरकारी विभागों के बजाय स्वतंत्र प्रोफेशनल एजेंसियों (Third-Party Auditors) से हर 6 महीने में कोचिंग सेंटर्स, मॉल्स और होटलों का औचक निरीक्षण कराया जाए।
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डिजिटल ट्रैकिंग: हर सार्वजनिक इमारत के बाहर एक ‘फायर सेफ्टी रेटिंग’ बारकोड अनिवार्य हो, जिसे स्कैन करके कोई भी छात्र या अभिभावक देख सके कि वह जगह सुरक्षित है या नहीं।
अवैध निर्माण और ‘सिंगल एग्जिट’ पर पूर्ण प्रतिबंध
लखनऊ और दिल्ली के हादसों में सबसे बड़ा विलेन ‘सिंगल एग्जिट’ (निकलने का सिर्फ एक रास्ता) रहा है। संकरी गलियों और बेसमेंट में चल रहे कोचिंग सेंटर्स मौत के कुएं बन चुके हैं।
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कड़ा नियम: जिन इमारतों में आपातकालीन निकास (Emergency Exit) नहीं है, उन्हें 24 घंटे के भीतर सील किया जाए।
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व्यावसायिक प्रतिबंध: रिहायशी इलाकों (Residential Areas) की तंग गलियों में व्यावसायिक गतिविधियों और कोचिंग सेंटर्स के संचालन को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए।
‘क्रिमिनल नेग्लिजेंस’ के लिए ज़ीरो टॉलरेंस पॉलिसी
जब तक लापरवाही बरतने वालों के मन में कानून का खौफ नहीं होगा, तब तक कुछ नहीं बदलेगा।
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जवाबदेही तय हो: ऐसे हादसों में सिर्फ बिल्डिंग मालिक या मैनेजर ही नहीं, बल्कि उस इलाके के फायर ऑफिसर और नगर निगम के संबंधित अधिकारी पर भी ‘आपराधिक लापरवाही’ (Criminal Negligence) का मुकदमा चलना चाहिए, जिन्होंने रिश्वत लेकर आंखें मूंद लीं।
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फास्ट ट्रैक कोर्ट: इन मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो ताकि दोषियों को महीनों के भीतर ऐसी सजा मिले जो मिसाल बन जाए।
रियल-टाइम मॉनिटरिंग और अनिवार्य स्मार्ट डिवाइस
पुरानी तकनीक के भरोसे अब सुरक्षा नहीं की जा सकती। सरकार को हर सार्वजनिक स्थान के लिए ‘स्मार्ट सेफ्टी’ नियम बनाना चाहिए:
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सेंट्रलाइज्ड अलार्म सिस्टम: हर कोचिंग और मॉल में ऑटोमैटिक स्प्रिंकलर (पानी छिड़कने वाला यंत्र) और स्मोक डिटेक्टर अनिवार्य हों, जो सीधे नजदीकी फायर स्टेशन के कंट्रोल रूम से जुड़े हों।
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बिजली लोड का डिजिटल ऑडिट: अक्सर आग शॉर्ट सर्किट से लगती है। कमर्शियल मीटरों पर बिजली के ओवरलोड की रियल-टाइम डिजिटल मॉनिटरिंग हो, ताकि लोड बढ़ते ही बिजली विभाग को अलर्ट मिल जाए।
अनिवार्य फायर ड्रिल और जन-जागरूकता
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हर संस्थान के लिए महीने में एक बार अनिवार्य फायर रेस्क्यू ड्रिल आयोजित करना कानूनन जरूरी किया जाए। छात्रों और कर्मचारियों को पता होना चाहिए कि आपातकाल में अग्निशामक यंत्र (Fire Extinguisher) कैसे चलाना है और सुरक्षित बाहर कैसे निकलना है। लोगों को जागरूक करना भी बेहद ज़रूरी है।
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