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किस्सा एक दिन का: मन में उठते हैं वो सवाल…जिनका मिलता नहीं जवाब

कौन है वो औरत जो बार बार हमें दिख जाती है..हम जाते हैं जहां....वो आ जाती है वहां...साजिश है या कोई इत्तफाक...मन में कितने उठ रहे हैं सवाल...पर क्या मिलेंगे इनके जवाब

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राजा आलम

एक दोस्त का कॉल आया कहां हो फ्री हो तो आओ ईरानी पर, चाय पीते हैं। मैं भी कमरे पर बैठकर यही सोच रहा था कि किसी को कॉल या मैसेज करूं चाय पीने के लिए। 10 मिनट में हम दोनों वहां पहुंच गए। चाय के लिए आवाज़ देकर गप्पे लगाने लगे। हमेशा की तरह चारों ओर सिगरेट का धुआं फैला हुआ था।

एक कारण ये भी है मैं देर तक चाय स्टॉल पर टिक नहीं पाता। मेरा सिर चकराने लगता है। हम चाय पी रहे थे तभी एक बूढ़ी महिला हमारे नजदीक आई और मदद मांगने लगी। हमने हाथ जोड़ लिया और चाय पीकर फौरन वहां से निकल गए। लेकिन हमें लंबी बातचीत करनी थी इसलिए हम जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी की तरफ निकल लिए।

जामिया गेट नंबर 8 के बाहर थोड़ी सी दूरी पर रोड किनारे टी स्टॉल है, जहां की खूबसूरती ये है कि धुआं को क़ैद करने वाली भीड़ नहीं होती। खुली जगह है एकदम शांत। वहां बैठना हमेशा से अच्छा अनुभव रहा है। यहां आते ही भैया को चाय बनाने के लिए कहा और डब्बे से 1-1 मट्ठी निकलकर खाने लगे। कुछ देर में चाय भी आ गई और हम दोनों चाय पीने लगे।

इतने में अचानक से किसी ने हमारी तरफ हाथ बढ़ाया और मदद करो बेटा इस तरह की आवाज़ भी। हमने जब सिर ऊपर किया तो देखा ये वही औरत थी जो कुछ देर पहले ईरानी चाय पर मदद के लिए आई थी। कुछ देर के लिए हम देखते ही चौंक गए। फिर हमने कहा आंटी हमें मुआफ़ कीजिए।

उनके जाने के बाद हम दोनों हैरत भरी नजरों से एक दूसरे को देखने लगे और फिर देखते ही देखते हंसने भी लगे। चाय खत्म होने के बाद हम दोनों कम्युनिकेशन सेंटर जो कि NFC के पास है उधर की तरफ निकल लिए टहलते-टहलते।

दिन ढल चुका था शाम भी अपनी विदाई ले रही थी। जब तक हम दोनों वहां पहुंचे अंधेरा चारों ओर फैल चुका था। लेकिन जल रहे टिमटिमाते बल्व के सामने लाचार सा नजर आ रहा था। आते ही पहले तो एक बोतल पानी लेकर हम बैठ गए।

फिर से वही करियर पढ़ाई रिसर्च आदि विषयों पर बतियाने लगे। बातचीत में इतने उलझे रहें कि समय का कुछ पता ही नहीं चला। इतने में कुछ खाने का भी मन हो गया तो सामने दो रोल बनाने के लिए कह दिया।

रोल अभी आया नहीं था कि इतने में एक बूढ़ी महिला फिर से बगल में आकर खड़ी हो गई। उन्हें तब तक हम नहीं देख पाए थे जबतक कि उन्होंने आवाज़ नहीं दी- बेटा कुछ मदद करो।

आवाज़ कान में जैसे आई मानों हम दोनों किसी गहरी नींद से जग गए ऐसी हालत हो गई। मुड़कर देखा तो हम दोनों सहम गए। ये कैसे हो सकता है असंभव! लेकिन इस बार हम दोनों से ज़्यादा वो महिला घबराई हुई दिखी और हमें देखते ही निकल ली। जी हां ये वही महिला थी जो ईरानी और जामिया के करीब अभी कुछ देर पहले ही हमसे मिली थी।

उसके जाते ही हम दोनों इस बार हंस नहीं रहे थे बल्कि घबराए हुए थे। जाने क्या क्या सोच विचार करने लगे। कौन है वो औरत क्यों हमसे बार बार मिल रही है? क्यों हमसे ही पैसों की मदद मांग रही है? हम जहां-जहां जा रहे हैं ये वहां-वहां कैसे पहुंच जाती है? ढेर सारे सवाल हमारे दिमाग में पनप रहे थे।

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