पता है शहर क्या होता है, पूरे सप्ताह काम के दौरान छुट्टियों का वेट करना या तो फिर वीकेंड खत्म होने का इंतेजार करना. क्यों चाहिए था ऑफ, किस लिए या किसके लिए आखिर क्या है वो? पूरे दिन कमरे में रहकर बस यही जवाब तलाशना. पता है इसका जवाब खोजते-खोजते वीकेंड खत्म हो जाता है. फिर ऑफिस जाकर पता लगता है शायद यही है वो जगह, जिसकी तलाश थी.
बट इतना तो है बस इसी को शहर नहीं कहते, तो फिर क्या है? जहां कमरे के बाहर चहल पहल है, शोर है, लोग हैं और भीड़ है, वो सब कुछ है जो एक इंसान को चाहिए. हर वो चीज जिसके लिए हम दौड़ते रहते हैं. बाहर हर वो जगह है जो रोमांचित कर सके. पर फिर भी क्यों कमरे के गहरे सन्नाटे को छोड़कर बाहर निकलने का मन नहीं होता?
आखिर मन को क्या चाहिए? शायद वो जो इंसान की जरूरत से भी ऊपर है. जो शहर की चमक से कोसो दूर है. या शायद वो जो शहर की इस भीड़ में कहीं खो गया है. शायद वो बाहर कहीं नहीं, मर गया कहीं अंदर ही अंदर. वरना सोचिए कोई विश्वप्रसिद्ध शहर में रहकर कैसे ऊब सकता है? आख़िर शहर के क्या मायने रह गए हमारे लिए?
पता है जहां आप काम करते हैं वो आपकी पूरी दुनिया बन जाती है और आपका कमरा उसका छोटा सा एक हिस्सा जहां सिर्फ़ नींद पूरी की जाती है. ताकि उस दुनिया में आप चल-फिर सके. लेकिन इस दुनिया से भी आप कब बाहर निकाल दिए जाएंगे कहना मुश्किल है. ऐसे में फिर किसी दूसरी दुनिया की तलाश करना आसान नहीं. इतनी सी दुनिया में जाने कितनी सारी दुनिया है सबकी. एक छोटी सी जिंदगी में कई सारी दुनिया की यात्रा करके अपनी दुनिया की तलाश करना कितना हैरत भरा काम है, है न?
क्या बस यही है शहर? क्या पता! जब इस दुनिया से बाहर निकलकर चंद दिनों या घंटों के लिए पूरी तरह से लौट आते हैं तो मानो किसी अजनबी दुनिया में चले आए हो. इसलिए शायद छुट्टियों में एकांत बेहद ज्यादा भाता है. एकांत वो जगह जब सारी जगहें आपसे छीन ली जाए तब ये जगह आपको जगह देती है. शहर में ये जगह मिल पाना भी किस्मत की बात है. वरना इस शोर में एकांत का मिलना बेहद मुश्किल है. एकांत खरीदना पड़ता हैं, या शायद कमाना.
शहर में एकांत की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है. ये आपको शोर से दूर रखने में बेहद मददगार है. शायद आपको आपसे मिलवाने में भी, अगर आप एक अच्छे अन्वेषक हैं तो. क्या कमरा भी इसी एकांत का एक हिस्सा है. शायद हां. बट जो भी हो इस एकांत में जो सुकून है वो किसी सुखद यात्रा से कम नहीं. आप दुनियाभर का सैर कर सकते हैं सिर्फ एक इस एकांत में रहकर. बट ये भी सच है कि रोजाना भीड़ से निकलकर एकांत में आना और एकांत से निकलकर भीड़ में जाना आसान नहीं होता. कई बार दोनों पराई लगती हैं
शायद शहर से दूर रहकर शरीर, शोहरत या दौलत को जिंदा नहीं रख सकते. बट शहर के करीब जाकर खुदको जिंदा रखना उससे भी मुश्किल है. अंतत: फैसला हमारे हाथ में होता है कि हम किसे चुनेंगे. बट हम जिसे भी चुनते हैं फैसला हमेशा सही नहीं होता. पता है शहर में रहकर शहर से दूर रहने की सोचना भी मत वरना खा जाएगा ये शहर. तुम कहीं भी चले जाओ खींच लाएगा और टांग देगा किसी चौराहे पर फिर चील कौवों से नोचवा देगा पूरा बदन.
आपने देखा नहीं कभी क्या? यूं ही राह चलते ऐसे बदन को रोड के किनारे या किसी नाले में. बहुत मिलेंगे ऐसे जो शहर में रहकर शहर से बैर रखने वाले थे. ये शहर कहीं का नहीं छोड़ता, कहीं का नहीं अगर आपने इसे अपनाकर भूल से भी छोड़ा तो. एक बात है शहर हमारी तरह बेवफा नहीं होता. आप निकल जाएंगे इससे बाहर पर ये आपके अंदर हमेशा रहता है. शायद आपके बाद भी कहीं.
राजा आलम


