अरुणेश:
सुशील जी, बात की शुरुआत कहां से की जाए? आपका प्रोफाइल बहुत बड़ा है – आप लेखक, कवि, पत्रकार, और फिल्म लेखक भी हैं। साथ ही आपने जामिया विश्वविद्यालय में पढ़ाई की और वहां पढ़ाया भी है। सबसे पहले बताइए, क्या फीलिंग होती है जब आप वहीं जाते हैं जहां आपने पढ़ाई की हो और अब प्राध्यापक के रूप में वहां होते हैं?
सुशील:
एक लाइन में कहूं तो अच्छा लगता है। क्योंकि सब कुछ जाना-पहचाना होता है। दोस्तों और जूनियर्स के साथ दोस्ताना माहौल रहता है। कोई दूरी नहीं रहती।
अरुणेश:
बहुत अच्छा। लेकिन एक सवाल और है – कांट्रैक्चुअल प्रोफेसर्स और रेगुलर प्रोफेसर्स के बीच कैसा अनुभव रहता है? छात्रों के नजरिए से भी क्या फर्क पड़ता है?
सुशील:
सभी नहीं, लेकिन अधिकांश लोग कांट्रैक्चुअल प्रोफेसर्स को सेकंड सिटीजन की तरह देखते हैं। कुछ सपोर्ट भी करते हैं। स्टूडेंट्स को वैसे तो रेगुलर प्रोफेसर पसंद आते हैं, लेकिन रिसर्च स्कॉलर्स थोड़े दूरी बनाकर रखते हैं।
अरुणेश:
तो आपका यह अनुभव क्या बताता है कि संविदा पर शिक्षकों की नियुक्ति – क्या यह सही है या इसमें बदलाव होना चाहिए?
सुशील:
सैद्धांतिक रूप से – नहीं। संविदा पर शिक्षक रखना ठीक नहीं है। व्यवहारिक रूप से भी – क्योंकि एक साल या सेमेस्टर के लिए पढ़ाने वाले शिक्षक का अनुभव पूरी तरह स्टूडेंट्स और माहौल से जुड़ने में पूरा नहीं हो पाता।
अरुणेश- सुशील जी, बात की शुरुआत कहां से की जाए? आपका प्रोफाइल बहुत बड़ा है – आप लेखक, कवि, पत्रकार, और फिल्म लेखक भी हैं। साथ ही आपने जामिया विश्वविद्यालय में पढ़ाई की और वहां पढ़ाया भी है। सबसे पहले बताइए, क्या फीलिंग होती है जब आप वहीं जाते हैं जहां आपने पढ़ाई की हो और अब प्राध्यापक के रूप में वहां होते हैं?
सुशील:
एक लाइन में कहूं तो अच्छा लगता है। क्योंकि सब कुछ जाना-पहचाना होता है। दोस्तों और जूनियर्स के साथ दोस्ताना माहौल रहता है। कोई दूरी नहीं रहती।
अरुणेश:
बहुत अच्छा। लेकिन एक सवाल और है – कांट्रैक्चुअल प्रोफेसर्स और रेगुलर प्रोफेसर्स के बीच कैसा अनुभव रहता है? छात्रों के नजरिए से भी क्या फर्क पड़ता है?
सुशील:
सभी नहीं, लेकिन अधिकांश लोग कांट्रैक्चुअल प्रोफेसर्स को सेकंड सिटीजन की तरह देखते हैं। कुछ सपोर्ट भी करते हैं। स्टूडेंट्स को वैसे तो रेगुलर प्रोफेसर पसंद आते हैं, लेकिन रिसर्च स्कॉलर्स थोड़े दूरी बनाकर रखते हैं।
अरुणेश:
तो आपका यह अनुभव क्या बताता है कि संविदा पर शिक्षकों की नियुक्ति – क्या यह सही है या इसमें बदलाव होना चाहिए?
सुशील:
सैद्धांतिक रूप से – नहीं। संविदा पर शिक्षक रखना ठीक नहीं है। व्यवहारिक रूप से भी – क्योंकि एक साल या सेमेस्टर के लिए पढ़ाने वाले शिक्षक का अनुभव पूरी तरह स्टूडेंट्स और माहौल से जुड़ने में पूरा नहीं हो पाता।
अरुणेश:
बहुत बढ़िया। अब हम चलते हैं साहित्य की दुनिया की ओर। सुशील जी, आपका उपन्यास और कहानी संग्रह बहुत प्रसिद्ध हैं – यह शहर, कबूलनामा, दोस्त दोस्त ना रहा, एनाइट विद वाइफ। साहित्य के प्रति आपकी रुचि कैसे विकसित हुई?
सुशील:
शुरुआत स्कूल और कॉलेज से हुई। हरिव बच्चन, कबीर पढ़े। कॉलेज में मित्रों और शिक्षकों की प्रेरणा मिली। धीरे-धीरे लिखना और प्रकाशित होना शुरू किया। यही टर्निंग पॉइंट बना।
अरुणेश:
अच्छा। वर्तमान में आप किस परियोजना पर काम कर रहे हैं?
सुशील:
एक नए उपन्यास ख्वाब-ए-शहर पर काम कर रहा हूँ। पिछले चार-पाँच साल से रिसर्च और लेखन में व्यस्त हूँ।
अरुणेश:
अब फिल्मों की दुनिया की ओर चलते हैं। आपने फेसबुक वाला प्यार जैसी फिल्म में स्क्रीनप्ले लिखा। क्या हर अच्छा साहित्यकार अच्छा फिल्म लेखक भी बन सकता है?
सुशील:
जरूरी नहीं। फिल्म टीम वर्क होती है, साहित्य व्यक्तिगत रचना। फिल्म में कलेक्टिव इनपुट होता है। यदि कोई साहित्यकार यह समझ जाए तो वह फिल्म लेखन में भी अच्छा कर सकता है।
अरुणेश:
आपके अनुभव में नए उभरते कहानीकारों को बॉलीवुड में ब्रेक मिलना आसान है?
सुशील:
सिर्फ कंटेंट अच्छा होना काफी नहीं है। सही नेटवर्क, सही संपर्क और अपनी मेहनत जरूरी है। होमवर्क और रिसर्च के बिना सफलता मुश्किल है।
अरुणेश:
और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट के बारे में आपका क्या नजरिया है? सेंसरशिप होनी चाहिए या नहीं?
सुशील:
थोड़ा बहुत कंटेंट होना चाहिए, समाज में जो दिखता है वही दिखाना चाहिए। लेकिन लिमिट क्रॉस नहीं होनी चाहिए। तार्किक रूप से सही चीजें आनी चाहिए।
अरुणेश:
अंत में, नए लोग फिल्म, ओटीटी या लेखन में आना चाहते हैं। आप उन्हें क्या संदेश देंगे?
सुशील:
सभी को अपना होमवर्क पूरा करना चाहिए। कंटेंट और रिसर्च के साथ आएँ। मेहनत और किस्मत मिलकर सफलता दिलाती है।
अरुणेश:
सुशील जी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने इतना बेबाक अंदाज में हमारे सवालों के जवाब दिए।
सुशील:
अरुणेश जी, आपका भी बहुत-बहुत धन्यवाद।
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