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हम रहें न रहें…ये दास्तां रहनी चाहिए…नज़रों से दूर रहें न रहें….पर दिलों का रिश्ता रहना रहना चाहिए   

डॉ. सुशील कुसुमाकर समकालीन हिंदी साहित्य और कविता से जुड़े रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं। उनकी रचनाओं में प्रेम, रिश्तों की जटिलता, सामाजिक यथार्थ, संवेदनाएं और मानवीय भावनाओं की गहरी अभिव्यक्ति दिखाई देती है। उनकी कविताओं की भाषा सरल, भावपूर्ण और पाठकों से सीधे जुड़ने वाली मानी जाती है। “रिश्ता रहे हम दोनों में तो अच्छा है” में भी रिश्तों की कड़वाहट, दूरी, मोहब्बत और भावनात्मक परिपक्वता का सुंदर चित्रण देखने को मिलता है।

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डॉ. सुशील कुसुमाकर

रिश्ता रहे हम दोनों में तो अच्छा है   

कुछ  राज़  रहे  दिल  में  तो  अच्छा  है,

थोड़ा  फ़र्क  रहे  हम  में  तो  अच्छा  है।

तुझे हमसे बेपनाह मुहब्बत है ये सब की ज़ुबाँ  पे है,

अब सिलसिला-ए-मुलाक़ात शुरू हो तो अच्छा है।

तू मशहूर है शहर में  चेहरा  बदलने  के लिए,

अब तू असल क़िरदार में आए तो अच्छा है।

तेरे क़िरदार के फ़साने बहुत सुने हैं हमने

सच क्या है, तू ख़ुद बताए तो अच्छा है।

तेरी मुहब्बत, क़समें, वादे सब छलावा है।

अब चर्चा न हो सर-ए-राह तो अच्छा है।

प्यार, वफ़ा, रिश्ते – ये सब खेल है तेरे लिए,

तू अब नहीं हमारी ज़िन्दगी में तो अच्छा है।

कभी नहीं कहेंगे कि तू साथ चल हमारे

पर रिश्ता रहे हम दोनों में तो अच्छा है।

यहाँ लोग मिलते हैं क़दम-क़दम पे,

कुछ छूट जाएँ हम से तो अच्छा है।

रुसवाइयाँ मिली हैं संग दिल शहर में

अब कोई साथ ना हो तो अच्छा  है।

तू साथ नहीं है ज़िन्दगी के कठिन सफ़र  में,

पर मंज़िल मिलने पे तू भी हो तो अच्छा है।

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