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बनना चाहते हैं बॉलीवुड रिपोर्टर…जानिए कैसा है फिल्म जनर्लिज्म में करियर?

लाइट्स, कैमरा और कलम- आज के दौर में फिल्म जर्नलिज्म में करियर का पूरा चरित्र-चित्रण बदल रहा है। वैसे तो बॉलीवुड रिपोर्टर्स को फिल्मों की ख़बरें, गॉसिप्स, शूटिंग रिपोर्ट, फिल्मी सितारों का इंटरव्यु, फिल्म रिव्यु जैसे कार्य करने होते हैं लेकिन क्या अब फिल्म जनर्लिज्म, पीआर जनर्लिज्म में बदल रही है...क्या अब पैसे लेकर फिल्म के अच्छे रिव्यूज लिखे जाते हैं? फिल्म पत्रकारिता में करियर की संभावनाओं और चुनौतियों पर बीबीसी की सीनियर फिल्म जनर्लिस्ट मधु पाल ने हमसे ख़ास बातचीत की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश

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नई दिल्ली: फिल्म पत्रकारिता को यूं तो अक्सर हल्के में लिया जाता है, लेकिन एंटरटेनमेंट जनर्लिज्म में भले ही नाम एंटरटेनमेंट का हो लेकिन यह एक सीरियस जनर्लिज्म है…ये  उतनी ही जिम्मेदार और चुनौतीपूर्ण पत्रकारिता है जितनी राजनीति या खोजी पत्रकारिता है।  ये कहना है सीनियर एंटरटेनमेंट जनर्लिस्ट मधु पाल का । उन्होंने YTNEWS 9 से फिल्म पत्रकारिता में करियर, चुनौतियों और इंडस्ट्री की सच्चाइयों पर खुलकर बात की।

फिल्म जनर्लिज्म बनाम पीआर जनर्लिज्म 

फिल्म पत्रकारिता पर लगने वाले ‘पीआर पत्रकारिता’ के आरोपों पर मधु पाल ने कहा कि पेड प्रमोशन आज मौजूद है, लेकिन इसके बावजूद कई पत्रकार आज भी निष्पक्ष और ईमानदार फिल्म समीक्षा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में इस क्षेत्र की साख सुधारने की जिम्मेदारी युवा पत्रकारों पर है।

स्टार्स के साथ टकराव और संतुलन

उन्होंने बताया कि फिल्म पत्रकारों को कई बार सितारों और प्रोडक्शन हाउस के दबाव का सामना करना पड़ता है। आलोचना ज़रूरी है, लेकिन उसे संतुलित और मर्यादित भाषा में प्रस्तुत करना भी उतना ही अहम है।

कोविड ने बदली फिल्म पत्रकारिता की तस्वीर

मधु पाल ने बताया कि कोविड-19 महामारी का सबसे गहरा असर फिल्म इंडस्ट्री और फिल्म पत्रकारिता पर पड़ा। पहले हर शुक्रवार को फिल्मों की रिलीज़, प्रेस कॉन्फ्रेंस, ट्रेलर लॉन्च और इंटरव्यू होते थे, लेकिन महामारी के बाद अधिकतर काम डिजिटल माध्यमों तक सीमित हो गया।

पहला बड़ा इंटरव्यू और सीख

उन्होंने अपने करियर का पहला बड़ा इंटरव्यू अभिनेता आमिर खान के साथ फिल्म तारे ज़मीन पर के दौरान किया। उस समय वे काफी नर्वस थीं, लेकिन पूरी तैयारी के साथ इंटरव्यू लिया। बाद में आमिर खान द्वारा उनके काम की सराहना किए जाने को उन्होंने अपने करियर का प्रेरणादायक क्षण बताया।

फिल्म जर्नलिस्ट बनने के लिए आवश्यक योग्यता

  • किसी भी सब्जेक्ट में ग्रेजुएशन होना चाहिए, जनर्लिज्म, मास मीडिया में डिग्री या डिप्लोमा हो तो बेहतर है।
  • फिल्मों के प्रति स्वाभाविक दिलचस्पी होनी चाहिए
  • फिल्म, टीवी और ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए बनने वाले कार्यक्रमों के प्रोडक्शन की  समझ होनी चाहिए।
  • निर्देशन, अभिनय, संगीत और तकनीकी पहलुओं की अच्छी जानकारी होनी चाहिए
  • बॉलीवुड, टीवी, ओटीटी, सोशल मीडिया जैसे माध्यमों में रुचि और अच्छी जानकारी
  • स्पष्ट, रोचक और तथ्यात्मक लेखन बेहद जरूरी है।
  • हिंदी, अंग्रेज़ी और मराठी जैसे क्षेत्रीय भाषा का ज्ञान होने से करियर का स्कोप बढ़ता है।
  • सही जानकारी जुटाना, तथ्यों की पुष्टि, निष्पक्ष विश्लेषण
  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, वेबसाइट, SEO और ट्रेंडिंग कंटेंट की जानकारी रखना जरूरी है
नेपोटिज़्म और आउटसाइडर कलाकार

नेपोटिज़्म पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि स्टार किड्स को शुरुआती मौके जरूर मिलते हैं, लेकिन इंडस्ट्री में टिके रहना केवल प्रतिभा पर निर्भर करता है। उन्होंने पत्रकारों से अपील की कि उभरते और बाहरी कलाकारों को भी समान मंच दिया जाए।

कास्टिंग काउच: एक कड़वी सच्चाई

मधु पाल ने स्वीकार किया कि कास्टिंग काउच फिल्म इंडस्ट्री की एक सच्चाई रही है। हालांकि सोशल मीडिया और #MeToo आंदोलन के बाद इसमें काफी हद तक कमी आई है, क्योंकि अब लोग खुलकर अपनी बात रख पा रहे हैं।

पापाराज़ी और सेलेब्रिटी की निजता

उन्होंने कहा कि कुछ कलाकार अपनी निजी जिंदगी को मीडिया से दूर रखना चाहते हैं, जबकि कुछ खुद पब्लिसिटी पसंद करते हैं। इसलिए पापाराज़ी संस्कृति को एकतरफा नजरिए से नहीं देखा जा सकता।

OTT प्लेटफॉर्म और सेंसर की जरूरत

OTT प्लेटफॉर्म पर बढ़ते कंटेंट को लेकर मधु पाल ने स्पष्ट गाइडलाइंस की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि रचनात्मक स्वतंत्रता जरूरी है, लेकिन युवा दर्शकों को ध्यान में रखते हुए नियमन भी होना चाहिए।

छात्रों के लिए सलाह

मास मीडिया और पत्रकारिता के छात्रों को सलाह दी कि वे पूरी तैयारी, ईमानदारी और निडरता के साथ इस क्षेत्र में आएं। अफवाहों से बचें, खबरों की पुष्टि करें और बिना किसी दबाव के सच लिखें।

पूरा इंटरव्यु देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें

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