नई दिल्ली. दिल्ली यूनीवर्सिटी ने बड़े ज़ोर-शोर से विश्वविख्यात कोलंबिया स्कूल ऑफ जर्नलिज़्म की तर्ज पर दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज़्म (डीएसजे) की शूरूआत की थी.
उम्मीद थी कि ये स्कूल डीयू के दिल्ली स्कूल ऑफ ईकॉनोमिक्स की तर्ज पर नाम रोशन करेगा लेकिन हो कुछ और ही रहा है. डीएसजे में पढ़ रहे छात्रों का आरोप है कि विभाग में बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है, मीडिया लैब्स बस नाम के हैं, काम के नहीं हैं.
यहां तक कि इस फुल टाइम कोर्स को पढ़ाने के लिए फुल टाइम फैकल्टी मेंबर्स नहीं है. न तो कॉन्ट्रैक्ट में टीचर्स हैं और न ही रिगुलर में. केवल गेस्ट फैकल्टी के बलबूते ये विभाग चल रहा है.
छात्रों का कहना है कि वे इन सब मुद्दों पर अपनी बात रखने के लिए जब डीएसजे की डॉयरेक्टर प्रो (डॉ.) भारती गोरे के पास गए तो उनकी बातें सुनकर भड़क गई और बुरी तरह से छात्रों को मारने की धमकी दी.
जूतों से मारने की बात कही
डीएसजे में पढ़ने वाले छात्रों ने संस्थान की निदेशक पर आरोप लगाया कि एकेडमिक और बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर के इश्यूज पर कुछ छात्र उनसे मिलने गए थे तो उनकी बात सुनी नहीं गई और नाराज होकर कहने लगीं कि ‘जूते से पीटूंगी, चुप रहो.’ छात्रों ने दावा किया कि उनके पास इस बात का वीडियो के रूप में सबूत भी है.
उधर छात्रों के इस आरोप पर संस्थान की निदेशक प्रो (डॉ.) भारती गोरे का कहना है कि छात्र बेवजह हंगामा कर रहे थे. कुछ छात्र सिर्फ धरना-प्रदर्शन और हंगामा करते रहते हैं. उनकी जो भी वाजिब शिकायतें या सुझाव हैं उसको खुले मन से सुना जाएगा और उनकी समस्याओं का समाधान भी किया जाएगा लेकिन अगर वे मिसबिहैव करेंगे तो उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी.
ख़बर का संपादकीय पहलू
दिल्ली विश्वविद्यालय देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक है. दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज़्म में फिलहाल 5 साल का इंटीग्रेटेड कोर्स चल रहा है जिसे पूरा करने पर छात्रों को मास्टर्स की डिग्री मिलती है वहीं 3 साल का कोर्स पूरा करने के बाद बैचलर्स की डिग्री मिलेगी.
आम तौर प्रोफेर्स और छात्रों के बीच बहस होती रहती है. सहमति और असहमति भी होती है. दोनों पक्षों में मतभेद होना स्वाभाविक है लेकिन दोनों पक्षों को अपनी बात शालीनता से कहनी चाहिए. छात्रों को न तो गुस्से में आकर हंगामा करना चाहिए और न ही टीचर्स को अपना आपा खोना चाहिए.
फिलहाल ये कोर्स सेल्फ फाइनेंस मोड में चल रहे हैं. स्कूल के पास अपना स्पेस नहीं है. स्टेडियम में ये विभाग चल रहा है. संस्थान के पास फुल फैकल्टी मेंबर्स होना चााहिए.
एडवांस मीडिया लैब्स होनी चाहिए. मीडिया या पत्रकारिता से जुड़े लोगों को विभाग में ज़िम्मेदार पदों पर होना चाहिए न कि हिंदी या अंग्रेजी विभाग के किसी प्रोफेसर को इस विभाग का कर्ता-धर्ता बनाया जाए. उम्मीद है कि डीयू प्रशासन इन मुद्दों पर ध्यान देगा.
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