नई दिल्ली. सूचना तकनीकी के इस दौर में भी रेडियो जनसंचार का सबसे सशक्त माध्यम है। सूचना के त्वरित प्रसार, सामाजिक जागरूकता और सांस्कृतिक संरक्षण में रेडियो की भूमिका आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी पहले थी। यह दिवस रेडियो पेशेवरों, प्रसारकों और श्रोताओं सभी के योगदान को सम्मानित करने का अवसर भी है।
वर्ल्ड रेडियो डे 2026 की आधिकारिक थीम
विश्व रेडियो दिवस मनाने की पहल वर्ष 2011 में UNESCO द्वारा की गई थी, जिसके बाद 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसे आधिकारिक मान्यता प्रदान की। 13 फ़रवरी की तिथि इसलिए चुनी गई क्योंकि इसी दिन 1946 में संयुक्त राष्ट्र रेडियो की स्थापना हुई थी।
“रेडियो और कृत्रिम बुद्धिमत्ता: AI एक उपकरण है, आवाज़ नहीं (Radio and Artificial Intelligence: AI is a tool, not a voice)।”
रेडियो की विश्वसनीयता और पहुंच
रेडियो को सबसे सुलभ और किफायती जनसंचार माध्यम माना जाता है। बिजली, इंटरनेट या महंगे उपकरणों की अनुपस्थिति में भी रेडियो सूचना का विश्वसनीय स्रोत बना रहता है। आपदा, महामारी या आपातकालीन परिस्थितियों में रेडियो ने हमेशा अग्रिम पंक्ति के संचार माध्यम के रूप में कार्य किया है।
ग्रामीण भारत में रेडियो की भूमिका
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में रेडियो की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। कृषि परामर्श, मौसम पूर्वानुमान, सरकारी योजनाओं की जानकारी, स्वास्थ्य जागरूकता इन सभी विषयों पर रेडियो कार्यक्रम ग्रामीण जनता के लिए उपयोगी सिद्ध होते हैं। सामुदायिक रेडियो स्टेशन स्थानीय भाषा और संस्कृति को भी संरक्षण देते हैं। किसानों के लिए खास कार्यक्रम आकाशवाणी से प्रसारित किए जाते हैं।
सोशल मीडिया के युग में रेडियो की भूमिका
तकनीक के विकास के साथ रेडियो ने भी स्वयं को बदला है। एफएम चैनलों की लोकप्रियता, इंटरनेट रेडियो, पॉडकास्ट और मोबाइल ऐप आधारित प्रसारण ने युवा पीढ़ी को भी रेडियो से जोड़े रखा है।
अब आप रेडियो कार्यक्रमों को मोबाइल ऐप के माध्यम से भी सुन सकते हैंअब श्रोता अपनी पसंद के कार्यक्रम कभी भी सुन सकते हैं, जिससे रेडियो की प्रासंगिकता और बढ़ी है।
रेडियो केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संवाद का भी सशक्त मंच है। यह विभिन्न समुदायों, भाषाओं और संस्कृतियों को आवाज़ देता है तथा समाज में बहुलता और सहभागिता को प्रोत्साहित करता है।
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