कु. प्रीती
आलोक श्रोत्रिय द्वारा लिखित यात्रा वृत्तांत “शिवलहेरा की गुफाओं का रहस्य” में पाँच अध्याय शामिल हैं : “सामान्य परिचय”, “ऐतिहासिक पृष्ठभूमि”, “गुफा की खोज और पूर्व शोध कार्य”, “गुफा और शिलालेख पर उत्कीर्ण लेख”, “गुफा संरक्षण और जन जागरूकता”।
इस पुस्तक में लेखक ने शिवलहरा की गुफाओं के विषय में अपने अनुभवों का अत्यंत अविस्मरणीय और प्रभावशाली ढंग से वर्णन किया है। इसकी भाषा शुद्ध एवं सरल हिंदी में है, जिससे पाठकों को पढ़ने में सहजता होती है। बीच-बीच में गुफाओं को चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है, जो विषय को और अधिक स्पष्ट बनाते हैं तथा पाठकों को समझने में कोई कठिनाई नहीं होती।
अमरकण्टक, विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों के संगम क्षेत्र में स्थित मैकल पर्वत पर अवस्थित है, जहाँ से नर्मदा, सोन और जोहिला नदियों का उद्गम होता है।यह स्थल न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि अपनी भौगोलिक, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक महत्ता के कारण भी अद्वितीय है।
अध्याय की शुरुआत अमरकण्टक की पौराणिक महत्ता से होती है, जहाँ नर्मदा नदी की उत्पत्ति को भगवान शिव से जोड़ते हुए अत्यंत रोचक और श्रद्धापूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है। वर्णन मिलता है कि समुद्र मंथन से निकले विष का पान करने के पश्चात उत्पन्न हुई जलन और उष्णता के उपशमन के लिए भगवान शिव ने अमरकण्टक की पहाड़ियों को अपना आसन बनाया, और उनके पसीने से नर्मदा नदी का उद्गम हुआ। यह भी उल्लेखित है कि शिव के कंठ में स्थित हलाहल विष के कारण उनके इस स्वरूप की पूजा यहाँ ‘अमकण्ठेश्वर’ के रूप में की गई, जिससे आगे चलकर इस स्थान का नाम ‘अमरकण्टक’ पड़ा।
‘आम्रकूट’ से ‘अमरकण्टक’ नाम के विकास का उल्लेख, विशेषकर कालिदास के मेघदूत के संदर्भ में, इस विवरण को साहित्यिक और ऐतिहासिक दोनों दृष्टियों से समृद्ध बनाता है। आम्रकूट पर्वत को आम के वृक्षों की प्रचुरता के कारण यह नाम प्राप्त हुआ था।
इसके पश्चात अमरकण्टक क्षेत्र के प्रमुख दर्शनीय स्थलों—जैसे सोनमूड़ा, कपिलधारा, माई की बगिया, कबीर चबूतरा, अरंडी संगम, श्री यंत्र मंदिर तथा विभिन्न आश्रमों—का उल्लेख किया गया है, जिनमें से अनेक का निर्माण कलचुरी शासकों द्वारा कराया गया था। यह विवरण पाठक को एक समग्र पर्यटन परिदृश्य प्रदान करता है। यह भाग न केवल धार्मिक पर्यटन को दर्शाता है, बल्कि प्रकृति प्रेमियों के लिए भी विशेष आकर्षण प्रस्तुत करता है।
अध्याय की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें शिवलहरा (सिलहरा) की गुफाओं जैसे अपेक्षाकृत कम ज्ञात, किन्तु अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल को प्रमुखता से उजागर किया गया है। ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण प्राचीन शिलालेखों का उल्लेख इस स्थल की ऐतिहासिक गहराई को प्रमाणित करता है और पाठकों में जिज्ञासा उत्पन्न करता है। साथ ही, गुफाओं की भौगोलिक स्थिति, केवई नदी का प्रवाह तथा आसपास का प्राकृतिक वातावरण अत्यंत सजीव रूप में चित्रित किया गया है।
भौगोलिक, भू-वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय विवरण इस अध्याय को शोधपरक स्वरूप प्रदान करते हैं। लोअर गोंडवाना समूह, बलुआ पत्थर की संरचना तथा नदी द्वारा किए गए अपरदन (कटाव) का उल्लेख इसे केवल वर्णनात्मक ही नहीं, बल्कि विश्लेषणात्मक भी बनाता है।
यातायात, आवास, यात्रा का उपयुक्त समय तथा अन्य व्यावहारिक जानकारी अत्यंत व्यवस्थित और उपयोगी ढंग से प्रस्तुत की गई है, जो इसे एक उत्कृष्ट पर्यटन मार्गदर्शिका का रूप प्रदान करती है।
सिलहारा तक पहुँचने के लिए रेल, सड़क तथा वायु मार्ग उपलब्ध हैं। गुफाओं के भ्रमण के लिए अक्टूबर से मार्च का समय उपयुक्त माना गया है, क्योंकि वर्षा ऋतु के बाद केवई नदी का जलस्तर बढ़ जाता है। ग्रीष्मकाल में यहाँ की बलुआ पत्थर की चट्टानें अत्यधिक तप्त हो जाती हैं, इसलिए गर्मी को ध्यान में रखते हुए यात्रा की योजना बनानी चाहिए। आवास की सुविधाएँ कोतमा या अनूपपुर में उपलब्ध हैं, जहाँ होटल, गेस्ट हाउस तथा अच्छी धर्मशालाएँ भी मौजूद हैं।
साथ ही, पर्यटकों के लिए दिए गए निर्देश—जैसे स्वच्छता, सुरक्षा और धरोहर संरक्षण—इस अध्याय को सामाजिक उत्तरदायित्व से भी जोड़ते हैं। गुफाओं की दीवारों पर खरोंच करना या मूर्तियों को स्पर्श करना दंडनीय अपराध है। प्लास्टिक, बोतल या अन्य कचरा न फैलाएँ तथा मोबाइल पर ऊँची आवाज में संगीत चलाने से बचें। फोटोग्राफी या ड्रोन के उपयोग के लिए ए.एस.आई. से पूर्व अनुमति आवश्यक है।
समग्र रूप से, यह अध्याय अनूपपुर जिले के सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक वैभव का संतुलित और प्रभावी चित्रण करता है। यह न केवल शोधार्थियों के लिए उपयोगी है, बल्कि सामान्य पाठकों और पर्यटकों के लिए भी एक प्रेरणास्रोत एवं मार्गदर्शक के रूप में अत्यंत सफल सिद्ध होता है।
पुस्तक में इन गुफाओं को ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है। यहाँ गुफाओं की प्राचीनता के भी प्रमाण मिलते हैं, जो उस समय की ओर संकेत करते हैं जब मानव पत्थर से औजार बनाना सीख रहा था। सोन नदी के किनारे प्राप्त पत्थर के औजारों के अवशेष इस बात की पुष्टि करते हैं कि अमरकंटक और उसके आसपास का क्षेत्र आदि मानवों का निवास स्थल रहा होगा।
वर्तमान में यहाँ की पहाड़ी पर पाँच प्रमुख गुफाएँ विद्यमान हैं।
मान्यता है कि महाभारत के पाँचों भाई—युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव—इन गुफाओं का उपयोग सुरक्षित आश्रय के रूप में करते थे और यहीं निवास करते थे। शिवलहरा की गुफाएँ आज भी जनमानस में महाभारत की स्मृतियों को जीवंत बनाए रखती हैं, जहाँ इतिहास और आस्था का सुंदर संगम दिखाई देता है।
शिवलहरा (सिलहरा) की दुर्वासा गुफा से प्राप्त शिलालेख से ज्ञात होता है कि प्रथम शताब्दी ईस्वी के आसपास यहाँ स्वामीदत्त नामक शासक का शासन था। ऐसा प्रतीत होता है कि कुषाणों के कमजोर पड़ने पर स्वामीदत्त ने अपनी संप्रभुता स्थापित कर स्वतंत्र शासक के रूप में शासन किया। संभवतः यह स्वामीदत्त छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा (वर्तमान शक्ति जिला) से प्राप्त गुंजी अभिलेख के कुमारवरदत्त की वंश परंपरा से संबंधित रहा हो सकता है।
स्वामीदत्त के अमात्य मूलदेव द्वारा ही इन गुफाओं का निर्माण कराया गया था। मूलदेव, शिवानंदी का प्रपौत्र, शिवदत्त का पौत्र तथा शिवमित का पुत्र था। शिलालेख प्राचीन इतिहास की जानकारी का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। यहाँ प्राप्त एक शिलालेख में शिवानंदी का उल्लेख मिलता है, परंतु उसके साथ ‘राजा’ शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है।
यह उल्लेखनीय है कि पवाया से प्राप्त मणिभद्र यक्ष की प्रतिमा पर राजा शिवनंदी के शासनकाल के चौथे वर्ष का उल्लेख मिलता है, जो संभवतः नाग वंश का शासक था और पद्मावती उसकी राजधानी थी। पवाया के शिवनंदी और शिवलहरा के निर्माता मूलदेव के दादा शिवानंदी के बीच क्या संबंध था, यह स्पष्ट नहीं है। संभव है कि कुषाणों के उत्कर्ष काल में पवाया की प्रारंभिक नाग शाखा कमजोर पड़ गई हो और उन्होंने इस घने वन क्षेत्र में आकर अपना सुरक्षित आश्रय बनाया हो। इसी कारण इन गुफाओं को नागवंशी गुफाएँ भी कहा जाता है।
ऐसा भी प्रतीत होता है कि प्राचीन नागवंशी शासक इन क्षेत्रों में निवास करते थे और कुषाणों की सत्ता के कमजोर पड़ने पर उन्होंने अपने वंश का पुनरोद्धार किया। सिक्कों और पौराणिक साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि कुषाणों के पतन के पश्चात नाग पुनः शक्तिशाली हुए और भारशिव नागों ने सनातन धर्म का पुनरोत्थान किया। कुषाणों के बाद दूसरी शताब्दी ईस्वी में अनूपपुर जिले के कुछ क्षेत्रों में मघ शासकों का भी प्रभाव रहा, जिनसे संबंधित अनेक अभिलेख बांधवगढ़ से प्राप्त हुए हैं।
अनूपपुर जिले और शिवलहरा की गुफाओं से संबंधित यह विस्तृत विवरण एक समृद्ध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करता है, जो पाठक को समय की गहराइयों में ले जाता है। यह वर्णन केवल एक स्थल का परिचय नहीं कराता, बल्कि उस पूरे अंचल की आत्मा को उद्घाटित करता है, जहाँ प्रकृति, इतिहास और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
पौराणिक एवं वैदिक संदर्भों के माध्यम से ‘कारूष जनपद’, राजा मान्धाता तथा महाभारत कालीन घटनाओं का उल्लेख इस क्षेत्र की सांस्कृतिक गहराई को और अधिक उजागर करता है। विशेष रूप से राजा विराट और पाण्डवों से जुड़ी स्थानीय मान्यताएँ शिवलहरा की गुफाओं को एक रहस्यमयी और आस्थामूलक पहचान प्रदान करती हैं। यह विवरण पाठक को लोकविश्वास और ऐतिहासिक तथ्यों के बीच एक रोचक सेतु का अनुभव कराता है।
राजनीतिक इतिहास का विस्तृत वर्णन—मौर्य, शुंग, सातवाहन, कुषाण, नाग, वाकाटक, गुप्त और कलचुरी वंशों से लेकर मुगल, मराठा और ब्रिटिश काल तक—इस क्षेत्र की निरंतर परिवर्तित होती सत्ता और उसके प्रभावों को स्पष्ट करता है। विशेष रूप से शिवलहरा के शिलालेखों, स्वामीदत्त और मूलदेव जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का उल्लेख इस स्थल की प्रामाणिकता और महत्व को और अधिक सुदृढ़ करता है।
लेखक ने इस स्थल पर पूर्व में कार्य कर चुके विद्वानों के योगदान और उनके समर्पण का अत्यंत व्यवस्थित ढंग से वर्णन किया है। इन विद्वानों ने पुरातात्विक साक्ष्यों की खोज एवं पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके परिणामस्वरूप आज यह स्थल एक महत्वपूर्ण धरोहर (हेरिटेज साइट) के रूप में स्थापित हो सका है। पुस्तक में विभिन्न प्रकार के स्रोतों का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है, जो इस विषय को और अधिक प्रमाणिक बनाते हैं।
डॉ. आर. के. शर्मा ने इस क्षेत्र से संबंधित पुरातात्विक विमर्श को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके अतिरिक्त हीरानंद शास्त्री, प्रो. डी. आर. भंडारकर, सीताराम शर्मा, जे. एन. मालपानी, नरेश कुमार तथा राजकुमार शर्मा जैसे विद्वानों ने भी इस क्षेत्र पर विविध शोध कार्य किए हैं। इन सभी ने स्थल के सर्वेक्षण के उपरांत अपने निष्कर्षों को विभिन्न प्रकाशनों, जैसे एपिग्राफिया इंडिका, मध्य प्रदेश गजेटियर तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की पत्रिकाओं में प्रकाशित किया।
इसके अतिरिक्त, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, पुरातत्व विभाग, सागर विश्वविद्यालय तथा एएसआई भोपाल सर्कल द्वारा भी इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए गए हैं। ‘मेकल इनसाइट्स’ जर्नल में अनूपपुर तहसील के पुरातात्विक स्थलों का विस्तृत अन्वेषण प्रकाशित किया गया।
वर्ष 2022 शिवलहरा और अनूपपुर के पुरातत्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ, जब ‘मध्य भारती’, ‘इंडियन जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजी’ तथा ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ हिस्ट्री’ में संबंधित शोध प्रकाशित हुए। इन शोधों में शिवलहरा की गुफाओं और शिलालेखों का विश्लेषण करते हुए गंभीरवा टोला उत्खनन के परिणामों को हिंदी में प्रस्तुत किया गया।
यद्यपि ये डिजिटल स्रोत अधिकतर सूचनात्मक और पर्यटन-केंद्रित हैं, फिर भी वे इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि इस महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहर की पहचान अब स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर सुदृढ़ हो चुकी है।
यह गुफा ब्राह्मी लिपि में प्राप्त अभिलेखों के कारण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जिनकी भाषा प्राकृत प्रतीत होती है, जो उस समय की स्थानीय भाषा थी। ये अभिलेख दूसरी–पहली शताब्दी ईसा पूर्व के राजा स्वामिदत्त के इतिहास पर प्रकाश डालते हैं।
दुर्वासा गुफा के अभिलेख से यह स्पष्ट होता है कि स्वामिदत्त ने इस स्थल पर न केवल स्थापत्य निर्माण करवाया, बल्कि बगीचों और वनों का रोपण भी कराया था। यह उस काल की सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय चेतना को दर्शाता है। इस प्रकार, यह स्थल केवल धार्मिक या स्थापत्य दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय परिप्रेक्ष्य में भी अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है।
गुफा के द्वार के बाहर स्थित एक विशाल, यद्यपि अब भग्न, मूर्ति के बाएँ हाथ पर अंकित अभिलेखों से ज्ञात होता है कि स्वामिदत्त के शासनकाल में सिवमित और मौगली के पुत्र, वत्स गोत्रीय मूलदेव द्वारा इन गुफाओं का निर्माण कराया गया था।
इन शिलालेखों पर आधारित विवरण ऐतिहासिक और भाषिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यद्यपि विद्वानों में इनकी तिथि को लेकर मतभेद है, तथापि अक्षरों की संरचना के आधार पर इन्हें प्रथमतः पहली शताब्दी ईस्वी का माना जा सकता है।
गुफाओं की भित्तियों पर बने उच्चित्रों की तिथि निर्धारित करना यद्यपि कठिन है, फिर भी उनकी शैली और विषयवस्तु महत्वपूर्ण संकेत प्रदान करती है। हाथी पर आरूढ़, छत्रधारी, मुकुट अथवा पगड़ी धारण किए तथा आभूषणों से अलंकृत व्यक्तियों के चित्र यह संकेत देते हैं कि वे किसी उच्च राजकीय वर्ग से संबंधित रहे होंगे। इन चित्रों में परिष्कृत शास्त्रीय शैली के स्थान पर एक रूढ़, लोकप्रधान शैली परिलक्षित होती है, जो उस क्षेत्र में विकसित हो रही कला की प्रारंभिक अवस्था को दर्शाती है।
विशेष रूप से, इनकी तुलना विदिशा और ग्वालियर क्षेत्र की यक्ष मूर्तियों से करने पर उनके आकार-प्रकार और अभिव्यक्ति में स्पष्ट समानता दिखाई देती है। द्वार के बाहर स्थित भग्न मूर्ति के हाथ में दिखाई देने वाली थैली भी विदिशा से प्राप्त मणिभद्र यक्ष की मूर्ति की स्मृति दिलाती है।
वंशावली संबंधी विवरण भी इन अभिलेखों का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। मूलदेव को शिवानंदी का प्रपौत्र तथा सिवदत्त का पौत्र बताया गया है, जो उस समय की वंश परंपरा और सामाजिक संरचना को समझने में सहायक है। उल्लेखनीय है कि यहाँ संस्कृत के ‘प्रपौत्र’ और ‘पौत्र’ जैसे शब्दों के स्थान पर प्राकृत शैली के अनुरूप उनके वैकल्पिक रूपों का प्रयोग किया गया है।
साथ ही, मूलदेव द्वारा अपनी माता मौगली (मोगली) का उल्लेख करना उस समय पारिवारिक पहचान के महत्व को भी रेखांकित करता है। विभिन्न क्षेत्रों में ‘नाती’ और ‘पौत्र’ शब्दों के परस्पर पर्याय रूप में प्रयोग की परंपरा भी इन अभिलेखों में परिलक्षित होती है, जिससे उनके अर्थ में लचीलापन स्पष्ट होता है।
समग्र रूप से, यह विवरण न केवल शिलालेखों की तिथि और भाषा पर प्रकाश डालता है, बल्कि उस काल की प्रशासनिक व्यवस्था, सामाजिक संरचना, कला शैली तथा सांस्कृतिक दृष्टिकोण का भी सजीव चित्र प्रस्तुत करता है। यह सामग्री इतिहास, पुरातत्त्व और प्राचीन भारतीय संस्कृति के अध्ययन के लिए अत्यंत मूल्यवान स्रोत के रूप में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
यह प्रस्तुति शिवलहरा (सिलहरा) गुफाओं के महत्व को केवल एक ऐतिहासिक या पर्यटन स्थल के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक धरोहर के रूप में स्थापित करती है। लेखक ने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से इस तथ्य को रेखांकित किया है कि विद्वत जगत अभी तक इस स्थल की वास्तविक महत्ता से पूर्णतः परिचित नहीं हो सका है, जिसके कारण इसे मानचित्र और पहचान—दोनों स्तरों पर अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया है।
महाशिवरात्रि जैसे अवसरों पर यहाँ लगने वाला विशाल मेला, हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति, तथा वर्ष भर आने वाले पर्यटकों और स्थानीय निवासियों की भागीदारी इस स्थल की सामाजिक और धार्मिक सक्रियता को दर्शाती है। फिर भी, यह स्पष्ट किया गया है कि केवल आगमन की संख्या संरक्षण की गारंटी नहीं देती—इसके लिए जागरूकता अनिवार्य है।
इस समीक्षा का केंद्रीय विचार “जन-जागरूकता” को संरक्षण की सबसे प्रभावी कड़ी के रूप में प्रस्तुत करना है। लेखक का मत है कि जब तक स्थानीय समुदाय, शिक्षण संस्थाएँ, पंचायत और प्रशासन मिलकर सहभागिता, शिक्षा और निगरानी के माध्यम से कार्य नहीं करेंगे, तब तक इस धरोहर की दीर्घकालिक सुरक्षा संभव नहीं है। विशेष रूप से यह बात सराहनीय है कि जन-जागरूकता को केवल सूचना तक सीमित न रखकर, व्यवहार परिवर्तन और सामुदायिक उत्तरदायित्व से जोड़ा गया है।
विरासत शिक्षा, ‘हेरिटेज वॉक’, व्याख्यात्मक सूचना-पटों की स्थापना, तथा स्थानीय युवाओं को ‘विरासत प्रहरी’ के रूप में प्रशिक्षित करने जैसे सुझाव अत्यंत व्यावहारिक और प्रभावशाली प्रतीत होते हैं। इसके साथ ही डिजिटल माध्यमों और सोशल मीडिया अभियानों—जैसे ‘सेल्फी विथ हेरिटेज’—का उल्लेख आधुनिक संदर्भ में जागरूकता फैलाने के लिए एक अभिनव दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
लेखक : आलोक श्रोत्रिय
मूल्य: ₹180
प्रकाशक : एविन्सपब पब्लिशिंग, शिवम कॉम्प्लेक्स, कोनी, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
प्रथम संस्करण : 2026
पृष्ठ : 78




