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प्रेम, संवेदना से भरी कविताओं के माध्यम से सिस्टम पर प्रहार..जानिए क्यों ख़ास है ‘शहर की तासीर’ !

हिन्दी के युवा लेखक सुशील कुसुमाकर अपने साहित्यिक लेखन के माध्यम से वर्तमान समय की परिस्थियों को शब्दों के अक्स में उकेरते हैं। उनके लेखन की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे सामयिक परिस्थितियों के असन्तोष, अस्वीकार को खुलकर दर्ज करते हैं । इसीलिए पाठक रचनाकार की संवेदना से सीधे जुड़कर उसे महसूस करता है। ‘शहर की तासीर’ कविता संग्रह में प्रेम के साथ प्रतिरोध को और सिस्टम की खामियों को किस मुखरता के साथ पाठक तक पहुँचता है, आइए जानते हैं

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डॉ. मो. अज़हर खान

समकालीन युवा कविता के परिदृश्य पर नज़र डाली जाए तो सैकड़ों नाम इसमें शुमार हैं । आज की युवा पीढ़ी साहित्यिक यात्रा के कई पड़ाव देख और समझ चुकी है । इनके नवोदित पीढ़ी से लेकर समकालीन कविता की युवा पीढ़ी एक साथ खड़ी है। इसे किसी दशक या कालखण्ड में विभाजित भी नहीं किया जा सकता है। इसलिए आज के कवियों को किसी भी सीमा रेखा में नहीं बांधा जा सकता है।

यथार्थ के धरातल से लेकर मायावी दुनिया के अंतर्जाल में कई युवा कवि समकालीन कविता को आगे बढ़ा रहे हैं।  यह सच है कि एक खास तबका युवा कवियों के एक महत्वपूर्ण हिस्से को आगे आने ही नहीं देना चाहता। क्योंकि उनकी कविता के भाव और विषय से उस तबके के तिलिस्म और उनके वर्चस्व के टूटने का डर हमेशा बना रहता है।

उनकी कविताओं में जहाँ प्रेम को उम्मीद की रौशनी और जीवन जीने के सुगम माध्यम के रूप में रचा गया है, वहीं बहुत सी उनकी कविताएं अकादमिक प्रतिरोध का जीवंत स्वर हैं, जहाँ व्यवस्था की खामियाँ, कवि को संवेदनात्मक स्तर पर महसूस होती हैं. यही कारण है कि उनका काव्य प्रतिरोध के स्वर को बहु आयामी दृष्टि से व्यक्त करता है.

सबसे बड़ी बात यह है कि ‘शहर की तासीर’ काव्य संग्रह की कविताओं को संवेदनात्मक धरातल पर परखने पर इससे पाठक का सघन रिश्ता बन जाता है. इसके दो कारण हैं, अव्वल यह कि इस संग्रह में प्रेम जीवन की उम्मीद का प्रतीक है। और इसमें जीवन से पलायन के बजाय उसे संजोने, संवारने और कुछ कर गुजरने की जिजीविषा अंत तक बनी रहती है.

कवि सुशील कुसुमाकर का यह तीसरा काव्य संग्रह है। अन्य दो संग्रहों (‘यह जो शहर’ और ‘कबूलनामा’) के बरअक्स इस काव्य संग्रह में कवि की संवेदना और वैचारिक स्थिति को भी अलग रूप में महसूस किया जा सकता है. इसका कारण है कि इसमें प्रेम का न मिलना जीवन का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है.

प्रेम सलीका है, विश्वास है, उमंग है, उल्लास है. यह सब कवि की संवेदना का वैचारिक पक्ष है. इसके साथ ही व्यवस्था की अव्यवस्था को कवि जिस संवेदनात्मक स्तर पर व्यक्त करता है, उससे भी उसके वैचारिक पक्ष को पाठक आज के कवियों से भिन्न रूप में देखता है. इसकी वजह है कि कवि ने बेहिचक और बेबाक अंदाज़ में उन कमियों को पाठक तक पहुँचाने की कोशिश की है.

इस तर्ज की कविताओं को पढ़ने पर पाठक के सामने स्वाभाविक बिम्ब उभरता चला जाता है. इससे पाठक कवि की वैचारिक संवेदना तक स्वयं पहुँच जाता है. यही इस काव्य संग्रह की विशेषता है.

(समीक्षक डॉ. मो. अज़हर खान भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग, छत्तीसगढ़ के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)

 

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