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पत्रकार..पार्टी के प्रवक्ता नहीं, पब्लिक की बनें आवाज़..तभी लोगों का मीडिया पर बढ़ेगा विश्वास

पत्रकारिता को हमारे लोकतंत्र में चौथे स्तंभ के रूप में माना जाता है। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता...लोकतंत्र के ये चार मज़बूत स्तंभ होते हैं..इनमें से अगर कोई भी एक स्तंभ अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से दूर भागता है या पारदर्शिता के साथ ईमानदारी और निस्पक्ष भाव से अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता है तो फिर लोकतंत्र कमजोर होता है। रूबरू में आइए मिलते हैं एक ऐसे पत्रकार से जिन्होंने मेनस्ट्रीम मीडिया में काम करने के बाद, उसकी खूबियों-खामियों को समझने के बाद अब नई पीढ़ी के पत्रकारों को इस प्रोफेशन की बारीकियां समझा रहे हैं

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हमारी खास पेशकश “सिलसिला अनकही बातों का में आपको रूबरू कराने जा रहे हैं एक ऐसी शख्सियत से जो सिर्फ एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि समाज में अलग-अलग किरदारों में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। पिछले 18 वर्षों से टीवी और रेडियो इंडस्ट्री के साथ-साथ मीडिया एकेडमिक्स की भी कमान संभाल रहे हैं। हमारे साथ जुड़े हुए हैं प्रोड्यूसर व एंकर के रूप में काम कर चुके डॉ. अरुणेश द्विवेदी जी।
सर, नमस्कार, आपका बहुत-बहुत स्वागत है। सबसे पहले मैं मीडिया में आपकी शुरुआत के बारे में जानना चाहूंगी कैसे शुरुआत हुई, कहां से प्रेरणा मिली?
यह बहुत कॉमन और जनरल प्रश्न है। मैं कानपुर का रहने वाला हूं। बीएससी मैंने फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स से बीएनडी कॉलेज, कानपुर से की। जैसा आज की जेनरेशन में होता है, वैसा हमारी जेनरेशन में भी था कि हमें टीवी में काम करना है, और टीवी में भी खासकर एंकर या रिपोर्टर ही बनना है।
जब मैं बीएससी कर रहा था, उस दौरान अपने पैरेंट्स को यह समझाना कि एमएससी नहीं करना, बल्कि जर्नलिज्म का कोर्स करना है थोड़ा कठिन था। मेरी माता जी हाउसवाइफ हैं और पिता जी गवर्नमेंट टीचर रहे हैं। लेकिन उन्होंने कहा “जिसमें तुम्हारा पैशन है, वही करियर चुनो।” मुझे घर से पूरा सपोर्ट मिला।
कानपुर से मैं दिल्ली आया। जामिया मिलिया इस्लामिया और आईआईएमसी दोनों जगह एंट्रेंस दिया। आईआईएमसी में लिखित परीक्षा क्लियर हुई, लेकिन इंटरव्यू के बाद एडमिशन नहीं मिला। उस समय सपना अधूरा रह गया, लेकिन किस्मत देखिए लगभग 10 साल बाद उसी आईआईएमसी के रेडियो-टीवी डिपार्टमेंट में पढ़ाने का अवसर मिला, और तीन साल मैंने वहां कॉन्ट्रैक्चुअल फैकल्टी के तौर पर पढ़ाया।
शुरुआती संघर्ष कैसा रहा?
संघर्ष बहुत रहा। जामिया में पढ़ाई के दौरान टीवी चैनलों की बारीकियां सीखीं। एंकरिंग-रिपोर्टिंग के आगे भी दुनिया है यह वहीं पता चला। IBN7 में इंटर्नशिप मिली, लेकिन सिर्फ एक महीने की। मैं फ्री में भी काम करने को तैयार था, पर प्रोसीजर के कारण नहीं बढ़ी।
फिर फिल्म सिटी के चक्कर लगाए हर गेट पर सीवी दिया, रिक्वेस्ट की कि “भैया, एचआर तक पहुंचा देना।” यह सब हर नए स्टूडेंट को जानना चाहिए अगर आपका कोई गाइड या कॉन्टैक्ट नहीं है, तो भी आप अपने टैलेंट से करियर बना सकते हैं। मेरा मीडिया में कोई रिलेटिव नहीं था, फिर भी आया और लंबे समय तक काम किया।
टीवी न्यूज में जॉब मिली, फिर अलग-अलग चैनलों में अवसर मिले। ऑल इंडिया रेडियो से बचपन से जुड़ाव था, समाचार, विविध भारती सुनता था। बाद में रेडियो में कैजुअल अनाउंसर के तौर पर जुड़ा आज भी जुड़ा हूं।
इंडस्ट्री से अकादमिक क्षेत्र में क्यों आए?
मेरा प्लान क्लियर था पहले खुद काम करूंगा, फिर पढ़ाऊंगा, ताकि छात्रों को प्रैक्टिकल दिखा सकूं स्क्रिप्ट कैसे बनती है, रिकॉर्डिंग कैसे होती है, एंकरिंग के बेसिक्स क्या हैं। आईआईएमसी के बाद जामिया, शारदा यूनिवर्सिटी, मंगलायतन यूनिवर्सिटी में पढ़ाया और अभी मीडिया कॉलेज से जुड़ा हूं। पढ़ाना मेरे ब्लड में है।
स्टूडेंट्स को लेकर आपका मुख्य उद्देश्य क्या रहता है?
मेरे लिए हर स्टूडेंट जरूरी है चाहे कमजोर हो या टैलेंटेड। मैं फ्रंट बेंचर्स से ज्यादा बैक बेंचर्स पर फोकस करता हूं। उन्हें डांटकर, प्यार से समझाकर इंडस्ट्री के लिए तैयार करता हूं। टीवी रेडियो में 1-1 सेकंड और न्यूज़ पेपर 1-1इंच स्पेस की वैल्यू है। इसलिए अनुशासन और टाइम मैनेजमेंट जरूरी है।
कंटेंट राइटिंग में अच्छा लेवल कैसे हासिल किया जाए?
सबसे बेसिक — Read, Write, Speak
  • खूब पढ़िए
  • जो पढ़ें, लिखिए
  • बोलकर प्रैक्टिस कीजिए
साहित्य में रुचि है तो प्रेमचंद भी पढ़िए, चेतन भगत भी। जितना पढ़ेंगे, उतना समझेंगे।
पत्रकार हैं, साहित्यकार नहीं — इसलिए:
  • सामान्य बोलचाल की भाषा प्रयोग करें
  • छोटे वाक्य लिखें
  • न्यूज को निबंध या उपन्यास की तरह न लिखें
  • टारगेट ऑडियंस समझें
 ऑल इंडिया रेडियो के कार्यक्रमों पर कुछ बताइए।
बचपन से रेडियो सुनने का संस्कार था। ‘युववाणी’ से शुरुआत हुई। पहला प्रोग्राम ‘महफ़िल’ किया युवाओं से जुड़ा शो। 500 रुपये का चेक दो महीने बाद मिला, लेकिन खुशी पैसों की नहीं अपनी आवाज़ रेडियो पर सुनने की थी। ‘मनभावन’, ‘ग्राम संसार’ जैसे कृषि आधारित कार्यक्रम किए। किसानों की चिट्ठियां आती थीं  वह अनुभव यादगार रहा।
टीवी मीडिया पर आपकी पुस्तक Credibility of News Channels क्या कहती है?
मीडिया की दशा-दिशा आत्ममंथन मांगती है। खबरें शोर नहीं होतीं उनमें भावनाएं होती हैं। रिसर्च में दर्शकों ने कहा चैनल खबर कम, शोर ज्यादा दिखाते हैं। सेल्फ-रेगुलेशन जरूरी है। एक मजबूत मीडिया काउंसिल होनी चाहिए, जिसमें प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल सब शामिल हों।
सिस्टम के अंदर रहकर ही बदलाव संभव है। अगर मीडिया ईमानदारी से गाइडलाइंस फॉलो करे, तो पत्रकारिता की प्रतिष्ठा वापस आ सकती है। पत्रकार प्रवक्ता नहीं, जनता की आवाज़ बने,तभी लोगों का मीडिया पर विश्वास बढ़ेगा

वीडियो इंटरव्यू देखने के लिए क्लिक करें ( सौजन्य से- ज्ञानार्थी मीडिया )

 

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