नई दिल्ली। टीवी न्यूज़ चैनल्स गंभीर विश्वसनीयता के संकट से क्यों गुजर रहे हैं। दर्शकों के बीच चैनलों की विश्वसनीयता कैसे बढ़ेगी..जैसे कई सवालों के खोजने की कोशिश करती है कि क्रेडिबिलिटी ऑफ न्यूज़ चैनल्स..!! इन मुद्दों पर लिखी गई ये पुस्तक पूरी तरह अनुभवजन्य शोध (Empirical Research) पर आधारित है, जिसमें टीवी दर्शकों और मीडिया प्रोफेशनल्स दोनों की राय शामिल है ।
आपकी पुस्तक का शीर्षक ही ‘न्यूज़ चैनलों की विश्वसनीयता’ है। क्या यह मीडिया पर सवाल उठाती है या उसके कारणों को समझाने की कोशिश करती है?
यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। मेरी यह पुस्तक सिर्फ सवाल खड़े नहीं करती, बल्कि उन सवालों के जवाब खोजने की कोशिश करती है। मैंने इसमें यह समझने का प्रयास किया है कि आज टीवी मीडिया की दशा और दिशा क्या है और आखिर न्यूज़ चैनल्स एक क्रेडिबिलिटी क्राइसिस से क्यों जूझ रहे हैं।
यह पुस्तक पूरी तरह शोध और अनुभवजन्य अध्ययन (Empirical Study) पर आधारित है, जिसमें दर्शकों और टीवी पत्रकारों, दोनों के विचार शामिल हैं।
क्या यह पुस्तक सिर्फ आपके विचारों का संकलन है या शोध आधारित है?
बिल्कुल शोध आधारित है। ‘विश्वसनीयता’ कोई व्यक्तिगत राय नहीं हो सकती। इसके लिए हमने प्रश्नावली के ज़रिए टीवी दर्शकों की राय ली, डेटा का विश्लेषण किया और उसके बाद निष्कर्ष निकाले।
एक अहम निष्कर्ष यह है कि लोकप्रियता (Popularity) और विश्वसनीयता (Credibility) का सीधा संबंध नहीं होता। कोई चैनल बहुत लोकप्रिय हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह उतना ही विश्वसनीय भी हो।
आपके अनुसार न्यूज़ चैनलों में समस्या किस स्तर पर सबसे ज्यादा है?
समस्या हर स्तर पर है-
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न्यूज़ सिलेक्शन
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न्यूज़ गैदरिंग
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न्यूज़ प्रेज़ेंटेशन
अक्सर रिपोर्टर को पहले से तय एजेंडे के साथ भेजा जाता है। विरोधी विचारों को या तो जगह नहीं मिलती या उन्हें जज किया जाता है। इससे खबर का संतुलन बिगड़ता है। आज का दर्शक बहुत समझदार है। वह जानता है कि क्या पूरी सच्चाई है और क्या नहीं।
किसान आंदोलन जैसे मुद्दों पर मीडिया कवरेज को आप कैसे देखते हैं?
अगर किसी आंदोलन में कुछ आपत्तिजनक तत्व हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि पूरा आंदोलन ही गलत या देशविरोधी है।
जब मीडिया कुछ प्रतिशत घटनाओं को पूरे आंदोलन का चेहरा बना देता है, तो दर्शक समझ जाता है कि तथ्य और सत्य के साथ समझौता किया गया है। और जब ऐसा होता है, तो चैनल की विश्वसनीयता अपने आप गिरती है।
टीआरपी को लेकर आपने अपनी पुस्तक में क्या रुख अपनाया है?
टीआरपी निश्चित रूप से एक कारण है, लेकिन मैंने इसे मुख्य विषय नहीं बनाया। समस्या यह है कि चैनल यह मान लेते हैं कि जो कंटेंट टीआरपी लाएगा, वही दिखाया जाए—चाहे वह कितना ही गैर-जिम्मेदार क्यों न हो। जबकि सच्चाई यह है कि अच्छी, सच्ची और तथ्यात्मक खबरें देखने वाले दर्शक आज भी मौजूद हैं, खासकर युवा वर्ग में।
दर्शकों की भूमिका को आप किस तरह देखते हैं?
दर्शक भी बंटे हुए हैं। कुछ लोग वही चैनल देखते हैं जो उनकी विचारधारा से मेल खाता है। लेकिन हमारे शोध के अनुसार, बहुसंख्यक दर्शकों का मानना है कि आज के टीवी न्यूज़ चैनल एजेंडा सेटिंग और प्रोपेगैंडा पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
हालांकि, अंतिम जिम्मेदारी दर्शकों की नहीं बल्कि पत्रकारों और चैनलों की है। दर्शक प्रोफेशनल जर्नलिस्ट नहीं होते।
आपकी पुस्तक की लक्षित पाठक-श्रेणी (टारगेट आडियंस) कौन है?
यह पुस्तक सिर्फ अकादमिक लोगों या मीडिया इंडस्ट्री के लिए नहीं है। एक सामान्य दर्शक भी इसे पढ़कर समझ सकता है कि टीवी पर दिखाई जाने वाली खबरें कितनी सच और कितनी विश्वसनीय हैं। साथ ही, यह पुस्तक मीडिया छात्रों के लिए बेहद उपयोगी है, ताकि वे समझ सकें कि विश्वसनीयता का संकट क्यों है और इसे कैसे दूर किया जा सकता है।
आप इस पुस्तक के ज़रिए क्या संदेश देना चाहते हैं?
पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। लेकिन आज इस स्तंभ में विश्वसनीयता रूपी दीमक लग चुकी है। अगर समय रहते इसे नहीं रोका गया, तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं होगा। मेरी उम्मीद है कि नई पीढ़ी के पत्रकार इस खोई हुई विश्वसनीयता को दोबारा स्थापित करेंगे।
“क्रेडिबिलिटी ऑफ न्यूज़ चैनल्स” केवल मीडिया की आलोचना नहीं करती, बल्कि समाधान की दिशा भी दिखाती है। यह पुस्तक दर्शकों, छात्रों और मीडिया पेशेवरों-तीनों के लिए एक जरूरी पाठ है।
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