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प्रकृति ने धरती पर हर प्राणी को दिया है रहने का अधिकार..फिर भी गलियों में रहने वाले जीव हो रहे लाचार !

कभी जंगलों में स्वाभाविक रूप से जीने वाले जानवर आज इंसानी समाज की गलियों में अपनी पहचान और ज़िंदगी की भीख मांग रहे हैं। हमने उन्हें बेघर किया, मजबूर किया, और अब आवारा कहकर खदेड़ रहे हैं। ये लेख एक सवाल है- क्या आज़ादी का अर्थ सिर्फ इंसानों तक सीमित है?

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प्रतीकात्मक चित्र

पहले हमने उनसे उनका घर छीना, उन्हें जंगल से बेदखल कर दिया। उसके बाद अधिकतर तो चिड़ियाघर में सिर्फ नुमाइश के लिए रखे गए। ये मानवीय प्रेम या क्रूरता या पावर जो भी हो। मैं इसे उनकी आज़ादी का हनन के अलावा कुछ और नहीं मानता। हमने ही उजाड़ी उनकी बस्तियां हमने ही जलाए उनके घर और फिर हमने ही उन्हें पनाह के नाम पर क़ैद कर लिया। कई जानवरों प्रजातियां गायब हो रही हैं इन्हें बचाओ के नाम पर।

कुछ जानवर जिन्होंने अपने ठिकाने तबाह होने के बाद बड़ी मुश्किल से किसी कारणवश इंसानी समाज में अपनी जगह बनाई। उन्हें सिर्फ इसलिए जगह मिली क्योंकि ये हमारे फायदे के थे। कई सारे काम और खान पान इनके बिना संभव नहीं था। इनमें से एक डॉग भी है। कुछ डॉग्स को बेडरूम में जगह मिली। कुछ डॉग्स को पहरेदारी का काम मिला। कुछ को गेट पर तो कुछ को मिलिट्री में। लेकिन इन सबके बावजूद भारी संख्या में डॉग्स बच गए जो हमारे किसी काम के नहीं थे।

उन्होंने अपना घर सड़कों और गलियों को बनाए। यहां जिंदा रहना आसान नहीं था। खाने के लिए हर रोज़ संघर्ष करना होता। इंतजार करना होता की कोई जूठा या बचा हुआ फेकेगा। पहचान कर पाना भी मुश्किल था कि किसी ने खाने में ज़हर तो नहीं मिलाया। कईयों की तो सिर्फ इसी वजह से जान जाती रही है। आसान नहीं डॉग्स होना। लेकिन इन सबके बावजूद इनकी नस्लें हजारों साल से बढ़ती रहीं।

समाज से प्रताड़ना और दुत्कार मिलने की वजह से किसी की मानसिक संतुलन बिगड़ सकती है। ये मामूली नहीं बट स्वाभाविक और साइंटिफिक प्रमाणित भी है। इस स्थिति में उसका रवैया हर मुमकिन बदलेगा। ऐसे में वो किसी को भी नुकसान पहुंचा सकता है। डॉग्स के साथ भी यही होता रहा है। ऊपर से ऑर्डर आया है इनसे इनका ये घर भी छीन लो जो शायद कभी घर था ही नहीं।

अब इन्हें यहां से भी निकाला जा रहा है। क्यों? क्योंकि लोगों की शिकायत है कि ये उन्हें काटता है परेशान करता है। हजारों लाखों लोग हर साल प्राभावित होते हैं। क्यों करता है ऐसा इस विषय पर बिना विचार विमर्श किए हुए आदेश जारी। जरा सोचिए इन डॉग्स को यहां रहने को मजबूर किसने किया? इन्हें इस मनोस्थिति में पहुंचाया किसने? इन्हें आवारा नाम किसने दिया? क्या वाकई हर आज़ाद चीज़ आवारा होती है? आज़ादी को आवारा नाम दिया गया या यूं कहो कि बेघर जानवरों को आवारा कहा गया।

शायद सालों बाद ये लुप्त हो रही प्रजातियों में से एक होगी और चिड़ियाघर में नुमाइश की पुतली बनकर रह जाएगी। अब आप इन्हें यहां भी नहीं रहने दोगे तो ये कहां जाएंगे इनका घर तो हमने सदियों पहले उजाड़ दिया। यहां रहना इनकी मजबूरी रही न कि चॉइस। भले इन्हें जहां भी रख दो बट ये सिर्फ कैदी होंगे। वो कैदी जो आपके विरुद्ध नारे लगाने में सक्षम नहीं।

वो कैदी जो न्याय के न्यायालय जाने में सक्षम नहीं। वो कैदी जो हक़ के लिए आवाज़ उठाने में सक्षम नहीं। वो कैदी जो आजीवन बिना किसी सवाल के जिंदगी गुज़ार दे। वो कैदी जो जिन्हें अपनी बेगुनाही साबित करने का कभी मौका नहीं मिलेगा। वो कैदी आवारा जैसे अपमानित नाम से मुक्ति पाने के कोर्ट तक पहुंच नहीं सकता। वो कैदी जो अपने पूर्वजों और उनकी बस्तियां (जंगल) जलाने या उजाड़ने वालों के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज नहीं करा सकता। वो कैदी जो इस धरती पर बराबर का हिस्सेदार है।

राजा आलम

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